सदियों से रामलीला हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। विजयदशमी से पूर्व शारदीय नवरात्रि के समय रामलीला मंचन की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आजकल देश के कोने-कोने में रामलीला की धूम मची हुई है। क्या आप जानते हैं करीब 10 दिन तक चलने वाले भगवान श्री राम के इस उत्सव को मनाने की परंपरा करीब 11वीं शताब्दी में उत्तर भारत से शुरू हुई थी। रामलीला मंचन लोक-नाटक का एक रूप है। इसके साक्ष्य लगभग ग्यारहवीं शताब्दी में मिलते हंै। शुरूआती दौर में रामलीला मंचन महर्षि वाल्मीकि के महाकाव्य रामायण की पौराणिक कथा पर आधारित था, लेकिन अब इसकी पटकथा गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित महाकाव्य रामचरितमानस पर आधारित है। कथाओं के अनुसार 16वीं सदी में तुलसीदास के शिष्यों ने रामलीला का मंचन करना प्रारंभ किया था। कहा जाता है कि उस समय जब गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस पूरी की थी तब काशी के नरेश ने रामनगर में रामलीला मंचन कराने का संकल्प लिया था। तभी से देशभर में रामलीला का मंचन प्रारंभ हुआ। रामलीला अपने देश भारत में ही नहीं, बल्कि बाली, जावा, श्रीलंका जैसे देशों में प्राचीनकाल से ही किसी न किसी रूप में प्रचलित रही है। रामलीला का मंचन नेपाल, थाईलैंड, लाओस, फिजी, दक्षिण अफ्रीका, कनाडा, सूरीनाम, मॉरीशस में भी होता है। थाईलैंड में रामायण को रामाकिआन कहते हंै। वर्ष 2008 में यूनेस्को ने रामलीला को "मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत" में से एक घोषित किया था। हरियाणा के जिला हिसार के गाँव लोहारी राघो में भी इस ऐतिहासिक परंपरा का आगाज वर्ष 1949 में हुआ। यह ऐतिहासिक गाँव हजारों साल पुराने इतिहास के साथ-साथ सदियों पुरानी संस्कृति को भी अपने साथ लेकर चल रहा है। एक जमाने में गाँव लोहारी राघो की मशहूर रामलीला की चर्चा भी इस कदर थी कि राजधानी दिल्ली समेत देश-प्रदेश के कोने-कोने से लोग अपने काम-धंधे छोड़कर स्पेशल यहाँ रामलीला देखने आते थे। 76 साल पुरानी यह रामलीला न केवल गाँव लोहारी राघो की शान है बल्कि सांस्कृतिक विरासत का शृंगार भी है। यहां परंपराओं का रस है, रामभक्ति का भाव है जो 10 दिन तक चलने वाले इस उत्सव से भक्तों व दर्शकों को बांधे रखता है। इस रामलीला की सबसे बड़ी खासियत है कि यह सभी वर्गों, जातियों और धर्मों के लोगों को एक मंच पर साथ लाती है। यहाँ हर जाति, धर्म के कलाकार एक साथ मिलकर अभिनय करते हैं। वैसे तो गाँव लोहारी राघो में रामलीला की शुरूआत आज से ठीक 76 साल पहले वर्ष 1949 में हुई थी लेकिन इसके लिए तैयारियां वर्ष 1948 में ही शुरू कर दी गई थी। लोहारी राघो में रामलीला मंचन की शुरूआत करने वाले सभी कलाकार वर्ष 1947 में भारत-पाक विभाजन के उपरांत पाकिस्तान से आकर गाँव लोहारी राघो में बसे थे। बताया जाता है कि इनमें से कुछ कलाकार पाकिस्तान में भी एक ही इलाके के रहने वाले थे और वहाँ भी वे एक साथ मिलकर 1940 से लगातार रामलीला मंचन करते आ रहे थे। लोहारी राघो में रामलीला की शुरूआत करने वाले कलाकारों में मुख्यत: स्वर्गीय लछमन दास जरगर, स्वर्गीय हंसराज चांदना, स्वर्गीय अमरनाथ भाटिया, भिष्मबर दयाल चांदना, स्वर्गीय सुरजीत भेड़गोट, डॉ. बलदेवराज शर्मा व नंदलाल लिखा समेत अनेक कलाकार थे जो पाकिस्तान से आकर गाँव लोहारी राघो बसे थे। हमें गर्व है कि हमारी रामलीला के डायलोग, गीत और संवाद पूरे हिन्दुस्तान में हटकर है जिसकी बदौलत ही लोहारी राघो की रामलीला की पूरे हिन्दुस्तान में पहचान है। खास बात यह रामलीला जाति, धर्म, या उम्र के भेद के बिना पूरे गाँव को एक साथ लाती है। यह ब्लोग पूर्णतया लोहारी राघो रामलीला को ही समर्पित है। इस ब्लोग में हम आपको गाँव लोहारी राघो की मशहूर रामलीला की दिलचस्प व अनसुने किस्सों के बारे में जानकारी देने का छोटा सा प्रयास कर रहे हैं जिसके बारे में शायद आप इससे पहले नहीं जानते होंगे या बहुत कम जानते होंगे। लोहारी राघो रामलीला के पुराने कलाकारों व गाँव के वयोवृद्धों से यह समस्त जानकारियां जुटाई गई हैं। लोहारी राघो रामलीला का यह ब्लॉग पूरी तरह से भगवान श्री राम व उनकी लीलाओं को समर्पित है। जल्द ही लोहारी राघो की रामलीला नामक पुस्तक भी आपको पढ़ने को मिलेगी जो लगभग प्रकाशन के लिए तैयार है। यदि आप भी लोहारी राघो रामलीला पुस्तक की पीडीएफ प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें 9050260147 पर व्हाट्सअप कर देवें। यदि आप इस ब्लोग व लोहारी राघो रामलीला की पुस्तक के संबंध में कोई अनमोल सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। हमें आपके अनमोल सुझावों का इंतजार रहेगा। धन्यवाद।
- संदीप कम्बोज, मीडिया प्रभारी
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