- करीब 10 साल तक रामलीला में अंगद व रावण समेत निभा चुके कई किरदार
- गाँव लोहारी राघो का सरपंच रहते हुए भी रामलीला में कर चुके अभिनय
- जानें रामलीला में अभिनय को लेकर क्या बोले विधायक भ्याना
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| लोहारी राघो। श्री रामा कल्ब द्वारा आयोजित लोहारी राघो की रामलीला में रावण के किरदार में नजर आ रहे हैं हांसी विधायक विनोद भ्याना। |
संदीप कम्बोज
सबसे पहले वर्ष 1985 में मिला था अंगद का रोल
विधायक
विनोद भ्याना ने बताया कि वे रामलीला में अभिनय करने के शुरु से ही इच्छुक
रहे हैं। वर्ष 1985 में श्री रामा कल्ब द्वारा रामलीला का आयोजन किया जा
रहा था तो क्लब के डायरेक्टर हंसराज चांदना कलाकारों का चयन कर रहे थे। मैं
भी वहां पहुंच गया। डायरेक्टर ने पहली बार मुझे अंगद के रोल के लिए चयनित
किया। अंगद का किरदार दर्शकों को काफी पसंद आया। अगले साल दर्शकों की
डिमांड पर डायरेक्टर ने मुझे रावण का अभिनय करने को प्रोत्साहित किया। जबकि
उससे पहले वे स्वंय रावण का किरदार अदा करते आ रहे थे। दर्शक चाहते थे कि
मैं रावण का किरदार अदा करुं तो मुझे सभी की बात को मानना पड़ा और अगले कई
सालों तक रावण का किरदार निभाया जिसे दर्शकों ने बखूबी पसंद किया।
आज भी ताजा हो रही हैं पुरानी यादें
विधायक
विनोद भ्याना ने बताया कि उन्हें इस बात की बहुत खुशी है कि गाँव लोहारी
राघो के लोगों ने इस अनमोल सांस्कृतिक विरासत को सहेजकर रखा है। वे समाचार
पत्रों में व लोहारी राघो की बेबसाईट पर लोहारी राघो रामलीला के समाचारों
को पढ़ते हैं तो दिल खुश हो जाता है। पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं।
कलाकारी को जिंदा रखने वालों का दिल से धन्यवाद, इस बार भी एक दिन जरुर देखेंगे लोहारी की रामलीला
विधायक
विनोद भ्याना ने कहा कि मैं श्री रामा कल्ब, लोहारी राघो व उन सभी लोगों
का तहे दिल से धन्यवाद देना चाहता हूँ जिन्होंने इस कलाकारी को दशकों से
जिंदा रखा हुआ है। क्लब प्रबंधन व कलाकारों का जितना धन्यवाद किया जाए कम
है क्योंकि इन्होंने हमारे बुजुर्गों द्वारा शुरु की गई परंपरा को कायम रखा
है और उम्मीद है आने वाली पीढ़ी भी इसे ऐसे ही बनाए रखेगी। आज भी गाँव की
रामलीला देखने का बहुत मन करता है। कोशिश करेंगे इस बार एक दिन गाँव जाकर
जरुर रामलीला देखेंगे और पुरानी यादों को ताजा करेंगे।
रामलीला से मिली प्रेरणा को जीवन में अपनाएं तभी पूरा होगा मंचन का मकसद : विनोद भ्याना
विधायक
विनोद भ्याना ने कहा कि सिर्फ रामलीला का मंचन करना ही हमारा वास्तविक
उद्देश्य नहीं है। सही मायने में हमारा वास्तविक उद्देश्य तो तब पूरा होता
है जब हम रामलीला से मिलने वाली प्रेरणा से प्रेरित होें तथा उन्हें अपने
जीवन में अपनाएं।
1949 में हुई थी लोहारी राघो ऐतिहासिक रामलीला की शुरुआत
ऐतिहासिक गाँव लोहारी राघो हजारों साल पुराने इतिहास के साथ-साथ सदियों पुरानी संस्कृति को भी अपने साथ लेकर चल रहा है। सदियों से रामलीला हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। एक जमाने में गाँव लोहारी राघो की मशहूर रामलीला की चर्चा भी इस कदर थी कि राजधानी दिल्ली समेत देश-प्रदेश के कोने-कोने से लोग अपने काम-धंधे छोड़कर स्पेशल यहाँ रामलीला देखने आते थे। 73 साल पुरानी यह रामलीला न केवल गाँव लोहारी राघो की शान है बल्कि सांस्कृतिक विरासत का शृंगार भी है। यहां परंपराओं का रस है, रामभक्ति का भाव है जो 10 दिन तक चलने वाले इस उत्सव से भक्तों व दर्शकों को बांधे रखता है। इस रामलीला की सबसे बड़ी खासियत है कि यह सभी वर्गों, जातियों और धर्मों के लोगों को एक मंच पर साथ लाती है। यहाँ हर जाति, धर्म के कलाकार एक साथ मिलकर अभिनय करते हैं। वैसे तो गाँव लोहारी राघो में रामलीला की शुरूआत आज से ठीक 71 साल पहले वर्ष 1949 में हुई थी लेकिन इसके लिए तैयारियां वर्ष 1948 में ही शुरू कर दी गई थी। लोहारी राघो में रामलीला मंचन की शुरूआत करने वाले सभी कलाकार वर्ष 1947 में भारत-पाक विभाजन के उपरांत पाकिस्तान से आकर गाँव लोहारी राघो में बसे थे। बताया जाता है कि इनमें से कुछ कलाकार पाकिस्तान में भी एक ही इलाके के रहने वाले थे और वहाँ भी वे एक साथ मिलकर 1940 से लगातार रामलीला मंचन करते आ रहे थे। लोहारी राघो में रामलीला की शुरूआत करने वाले कलाकारों में मुख्यत: स्वर्गीय हंसराज चांदना, स्वर्गीय अमरनाथ भाटिया, स्वर्गीय लछमन दास जरगर, भिष्मबर दयाल चांदना, स्वर्गीय सुरजीत भेड़गोट, डॉ. बलदेवराज शर्मा व नंदलाल लिखा समेत अनेक कलाकार थे जो पाकिस्तान से आकर गाँव लोहारी राघो बसे थे।
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